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विश्वास की गड्डियां... अलग से रखीं हों

                
                                                         
                            मरतुल्ली-सी
                                                                 
                            
आह भरते हैं

जतन करने से
इतना डरते हैं :(

चीज़ों को,
संभाल-संभाल थक चुके हैं

जाने ख्वाब...
किस अवरोध कारण रुके हैं

दिल का नगर,
साफ़ हो जाए

सब देखते हुए...
इंसाफ़ किया जाए 🙏

मेरे क्रोध के लिए हों...
बर्फ़ की झीलें...

बेसब्र, बर्रें...
घुमड़-घुमड़ कहीं और चलीं जाएं...

ऐ, ख़ूबसूरती,
तुझसे क्या उधार है मेरा?

तुझे 'मरे' ही को क्यों...
और... मारना?

क्या क़ुर्बत की चाह...
साफ़ हो वो मंज़र!

कम-सा जहां...
बस दिखलाए सामने दर्पण 

मैं कुछ नहीं
मांग रहा...

ये शोर खतम कर दो?

किसी के पास नहीं हो...

ऐसे,
सब्र के सिक्कों से गुल्लक भर दो?

विश्वास की गड्डियां... अलग से रखीं हों...

-राहुल



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1 hour ago

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