पढ़ न पाएँ जो नयन की पाण्डुलिपि,
सुन सखे! 'संवाद' करना छोड़ दो।
भीड़ है इतनी कि धड़कन खो गई,
संवेदना भी अब सुनो, पत्थरा गई।
स्वार्थ के बाज़ार में सब लुट गए,
शब्द जब अर्थों से अपने कट गए,
व्यर्थ का नाता वहीं पर तोड़ दो।।
मापते हो सिंधु तुम लघु गर्त से,
जी रहे हो क्यों किसी की शर्त से?
काँच के टुकड़े चुभेंगे उम्र भर,
रक्त से अपनी हथेली मत रंगो,
राह अपनी तुम उधर से मोड़ दो।।
ढूँढ लो एकांत अपने आप में,
मग्न हो जाओ 'शिवम्' के जाप में।
मौन ही अब श्रेष्ठतम 'संवाद' हो,
सिर्फ अपने आप से बात हो।
'स्व' को अब 'सर्वस्व' से तुम जोड़ दो।।
-आचार्य प्रताप
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