क्या मिला इस युग में?
दौड़ रहा है काल किसी के, कोई समय से खोया है।
उसका क्या जिसने इस पथ पर, अपना सब कुछ खोया है॥
भोर हुई पर आस नहीं है,
सपने टूटे बिखरे हैं।
पथ पर चलते लोग सभी क्यों,
पदचिन्हों पर ठहरे हैं।
याद पुरानी घेर रही है,
नई उमंग कहीं खोई हैं।
और न जाने कैसे-कैसे,
जीवन-पथ पर मोड़ कई हैं।
क्या ही करते इस युग में भी
बेबस से ये लोग अरे -
जिनके हिस्से में जीने को, बस संघर्ष ही आया है॥
शहरों की ये प्रखर रोशनी ,
ग्राम कहीं धुंधलाते हैं।
विकासितता की होड़ में देखो,
सारे मूल्य भुलाते हैं।
कैसी आई विचित्र घड़ी ये,
मशीन बने इंसान यहाँ।
एक तरफ है प्रगति निरंतर,
दूजी ओर विश्राम कहाँ।
कैसा युग है आया देखो,
तन है लेकिन मन खोया है -
कितने जीवन की कोमलता, इन यंत्रों पर छाया है॥
स्वर्णिम रवि की किरणें भी क्यों,
अब बेजान-सी लगती हैं।
अधुनिकता की दौड़ में अब
खोई पहचाने सजती हैं।
मानवता की राह भूल कर,
भटक रहे हैं लोग सभी।
क्या खोया क्या पाया इसमें,
सोच रहे इंसान सभी।
जो खो बैठे अपनी धरती,
मिट्टी की वो खुशबू सारी -
उनके हिस्से का सुख सारा, जाने किसे न भाया है॥
-आचार्य प्रताप
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