बेटी ,
यह एक शब्द जिसमे पूरी दुनियां समाई है।
न जाने किस घड़ी में ईश्वर ने यह रचना बनाई है।
मां,पिता की जान और आंख का तारा जो
भाई ,बहन की लाडली जीने का सहारा जो ।
हर रिश्ते को प्रेम से सींचे
वह जीवन का सबसे सुंदर सितारा जो।
जन्म लेते ही अनेक रिश्तों में बंध जाती है
बढ़े होते हुए हर रिश्ते को प्रेम से महकाती है
घर की आन - बान और शान कहलाती
पैदा होते ही जिम्मेदारी साथ लाती है।
बड़ी हुई तो छोटे भाई, बहनों का ध्यान रखना
छोटी हुई तो बड़ों का सम्मान करना।
घर की चारदीवारी में रहना
मान मर्यादा और इज्जत का ख्याल रखना।
बचपन से ही सारे गुणों को सिखाना
क्योंकि बड़े होकर तो तुम्हें पराए घर जाना है।
विदा होते ही आंसू छिपाती है
मां,पिता दुखी न हो हस कर दिखाती है।
मायके और ससुराल के बीच सामंजस्य बिठाती है
भले ही वो घर का काम करते हुए काम पर जाती है ।
हां संसार बदल रहा है,
बेटियों को नई खूबी में गढ़ रहा है।
अब उनका एक काम नही हजारों काम है
पहले तो घर संभालना था
लेकिन अब घर और बाहर दोनों में कहां आराम है।
कहते हैं समाज में बदलाव आया है
लड़का- लड़की दोनों को समान अपनाया है।
लेकिन यथार्थ की कहानी कुछ और है
बेटी को घर और बाहर दोनों में कहां ठौर है।
बेटी को पंख चाहिए और खुले आसमान की राह भी
उसके सम्मान को मत रोकिए वही तो है कल की नई चाह भी।
बेटी है तो समाज में संस्कारों का बोलबाला है
वरना ईंटों के मकानों में कहां घरों सा उजाला है।
वह केवल एक संतान नहीं
हर परिवार का स्वाभिवान है।
माना बेटा और बेटी दोनों बराबर हैं
लेकिन बेटी से ही घर ,समाज और देश महान है।
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