मोरपंख ।
उंगलियों पर गिन-गिन,
मैं काट रही थी दिन,
वह मनमोहक छवि,
बंसी की मधुर बैन,
तुम्हारे दरस को व्याकुल नैन।
तुम्हारे गमन से निराश,
सदा रहती उदास,
फिर लेकर नई उमंग,
ऐसे उड़ आया हवा संग,
मोहन तुम्हारे माथे का मोरपंख।
कोई तान सुनाता मधुर रागिनी में,
तारों भरी इस यामिनी में,
ऐसे बैठा मेरे निकट आकर,
जैसे भेजा हो तुमने समझाकर।
समय के चक्र सब रोक दिए,
मेरे बहते अश्रु पोंछ दिए,
दशों दिशाओं में फैलाकर ,तुम्हारी भीनी सी सुगंध,
ऐसे उड़ आया हवा संग,
मोहन तुम्हारे माथे का मोरपंख।
किसे कहती अपनी विथा,
विरह का सागर अथाह,
मिला न जब कोई छोर,
लगी टूटने श्वासों की डोर।
मधुवन से गोकुल देश,
तुम्हारा लेकर संदेश,
फिर भरकर इस जीवन में नए रंग,
ऐसे उड़ आया हवा संग,
मोहन तुम्हारे माथे का मोरपंख।
गिरधर ,गोपाल,कुंज बिहारी,
सांवरा, मोर मुकुट धारी,
भांति-भांति के लेकर नाम,
सब पूछते कब आएगा श्याम?
करके दूर मिलन की हर बाधा,
कब आओगे ?प्रतीक्षा में ,तुम्हारी राधा,
इस मनमोहिनी छवि को ,करके हृदयंगम,
ऐसे उड़ आया हवा संग,
मोहन तुम्हारे माथे का मोरपंख।
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