तेरी यादों में हे प्रियतम , द्रग मेरे बहते रहे! आओगे कब पास मेरे ,लफ्ज ये कहते रहे!!
जबसे पाई है जुदाई ,चैन ना पल भर मिला.
कुम्हलाकर जीवन कमल फिर ,पानी में भी ना खिला .
वज्र का हृदय बनाकर , कैसे हम रहते रहे!
आओगे कब पास मेरे , लफ्ज ये कहते रहे !!
सूरज है उगता मगर , मेरी जिंदगी अंधियारे में .
गम मिला तन जा रहा ,जीवन मृत्यु के किनारे में .
इतने दिन से प्राण प्रियतम , गम तेरा सहते रहे !
आओगे कब पास मेरे लफ्ज ये कहते रहे!!
लेखक कवि पुष्पेंद्र सिंह यादव
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दिबियापुर औरैया
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