अगर मैं न रहूँ तो ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा?
एक तिनके के टूट जाने से दरिया का रुख़ कभी बदला नहीं करता,
एक ज़र्रे के खो जाने से सहरा कभी कम नहीं होता।
ज़्यादा से ज़्यादा बस इतना होगा—
कि अगली सुबह का सूरज मेरे बग़ैर निकल आएगा,
हवाएँ वैसे ही चलेंगी, दरख़्त वैसे ही झूमेंगें,
चिड़ियाँ वैसे ही चहचहा कर दिन का आग़ाज़ करेंगी।
कायनात की इस बे-अन्त वुसअत में
किसी के आने या जाने का कोई शोर नहीं होता।
सड़कें वैसे ही शोर मचाएँगी,
शहर अपनी पूरी रफ़्तार से दौड़ता रहेगा।
दीवारों पर लटके कैलेंडर के पन्ने
रोज़ की तरह चुपचाप पलटे जाएँगे,
और वक़्त, जो सबसे बेरहम हिसाब-दाँ है,
बिना रुके, बिना मुड़े आगे निकल जाएगा।
चंद लोग जो कभी क़रीब थे,
कुछ देर ठहरेंगे, एक सर्द आह भरेंगे,
फिर दीवार पर टँगी तस्वीर पर धूल जमने लगेगी।
बातें पुरानी हो जाएँगी, यादें धुंधली पड़ जाएँगी,
और एक रोज़ मेरा ज़िक्र भी बस एक इत्तेफ़ाक़ बन कर रह जाएगा।
किसी का चूल्हा नहीं बुझेगा,
किसी की नींद हमेशा के लिए नहीं छिन जाएगी।
ज़िंदगी इतनी ख़ुद्दार और बेपरवाह है
कि उसे आगे बढ़ने के लिए किसी एक चेहरे की ज़रूरत नहीं होती।
एक बिस्तर खाली होगा,
एक कोने में रखे जूतों पर गर्द जम जाएगी,
फ़ोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट में एक बे-जान सा नाम पड़ा रहेगा।
दुनिया के इस अज़ीम मेले में
एक साए के घट जाने से
तमाशा कभी रुका नहीं करता।
बस इतना ही होगा...
कुछ भी नहीं रुकेगा,
कुछ भी नहीं बदलेगा।
ज़मीन अपनी धुरी पर घूमती रहेगी,
और यह वजूद मिट्टी में मिल कर
अपनी आख़िरी ख़ामोशी को ओढ़ लेगा।
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