नहीं किसी पुरु एक के , भूमि नीर आकाश।
हर युग में कोशिश हुई, अंत सभी का नाश।।
-. पुरुषोत्तम श्रीवास्तव 'पुरु'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X