वो कहती है कि मैं जानती हूँ इरादे तेरे,
मेरी आँखों ने पढ़े हैं कई सारे वादे तेरे।
जो सुनती भी नहीं है सारी बातें मेरी,
फिर भी समझे है दिल के इशारे मेरे।
तुझे सोचूँ तो न जाने क्या-क्या सोचता हूँ,
कैसे कहूँ कि मेरे ख़्वाब भी हैं मुरादे तेरे।
कैसे कह दूँ कि मुझे तुझसे मोहब्बत है मगर,
मेरी तन्हाई में रहते हैं सब दिलकश नज़ारे तेरे।
तू समझती है मुझे और मैं छुपाता हूँ बहुत,
हमसे छुपते नहीं अब कोई बहाने मेरे।
तूने पूछा जो कभी—“क्या है मुराद आखिर?”
मैंने हँसकर कहा—“बस रहें ख़्वाब हमारे तेरे।”
तेरी हर बात में इक बात निकल आती है,
जैसे पढ़ता हो कोई दिल के इशारे तेरे।
तुझे जीतने की ज़िद तो नहीं करता है प्रिंस
बस मुझे याद रहें संग गुज़ारे पल तेरे।
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