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बस मुझे याद रहें संग गुज़ारे पल तेरे।

                
                                                         
                            ‎वो कहती है कि मैं जानती हूँ इरादे तेरे,
                                                                 
                            
‎मेरी आँखों ने पढ़े हैं कई सारे वादे तेरे।
‎जो सुनती भी नहीं है सारी बातें मेरी,
फिर भी समझे है दिल के इशारे मेरे।
‎तुझे सोचूँ तो न जाने क्या-क्या सोचता हूँ,
कैसे कहूँ कि मेरे ख़्वाब भी हैं मुरादे तेरे।
‎कैसे कह दूँ कि मुझे तुझसे मोहब्बत है मगर,
मेरी तन्हाई में रहते हैं सब दिलकश नज़ारे तेरे।
‎तू समझती है मुझे और मैं छुपाता हूँ बहुत,
हमसे छुपते नहीं अब कोई बहाने मेरे।
‎तूने पूछा जो कभी—“क्या है मुराद आखिर?”
मैंने हँसकर कहा—“बस रहें ख़्वाब हमारे तेरे।”
‎तेरी हर बात में इक बात निकल आती है,
जैसे पढ़ता हो कोई दिल के इशारे तेरे।
‎तुझे जीतने की ज़िद तो नहीं करता है प्रिंस
बस मुझे याद रहें संग गुज़ारे पल तेरे।
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48 मिनट पहले

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