बदनामियां मोहब्बत में अच्छी नहीं होकर बेकरार राह ए तलब अब तो हमें मजबूरियां अपनी ही बढ़ाना पड़ा है
सच तो ये होकर मायूस सामने आपके खिलाफ कर पाऊंगा मैं नहीं मिटा कर हसरतें सारी आंसू बहाना पड़ा है
कहूं गर मैं सच खुदा के मर्जी बगैर इक पत्ता हिल सकता नहीं जी के अंधेरों में अरमां दिल का मिटाना पड़ा है
मेरी बरबादियों पे हसने वाले जीने से भी फायदा क्या बना कर बहाने अब तो हमें फासला तुमसे बढ़ाना पड़ा है
अब तो हमें कभी भी सामना तेरा करना ही पड़ेगा मना कर हमें जश्न ए बर्बादी अपनी इरादा तेरा जानना पड़ा है
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