बहुत थक चुका हूं जिंदगी से कितने आंसू मैं और बहाऊंगा सुनसान राहों में लगा कर किसको जगाऊंगा
ऐ जिंदगी तेरी किताब के पन्ने जब मैं पलटता हूं हुआ दर्द भी बहुत दूर हो कर किसको आवाज लगाऊंगा
मैं अंधेरे घर में बैठ कर तन्हा हो जाऊंगा मगर याद रखना मैं भी भुला कर तुझे जिंदा न कभी रह पाऊंगा
हूं जिंदा तेरे बदौलत जब तुम याद करोगे करीब आ जाऊंगा और तुझे अपनी आवाज में दर्द सुना जाऊंगा
जुर्म ए खामोशी ना करके इल्तिज़ा करूंगा जरूर जब भी तू दर्द बढ़ाने की दवा देगा बेशक मैं पी जाऊंगा
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