दरकार था हमें होकर मायूस करीब तेरे आज आना पड़ा समझ कर मिजाज़ देकर आवाज तुम्हें बुलाना पड़ा
मैं भुला भटका इक नादां मुसाफिर दर्द तुमसे ही कहना चाहता हूं करके अर्ज तुमसे ही दर्द सारा बताना पड़ा
सुना के हाल ए गम अपना तुमसे गुजारिश करना पड़ा है सामने तेरे आया हूं क्यूं मजबूरी हमको बताना पड़ा
इक तुम हो जो लौ चिराग की कम करते नहीं दर्द का कभी कद्र करो बजा के धुन सितार पर दर्द सुनाना पड़ा
निकल के हैरतों से कहना पड़ा ये जो जश्न तुम मना रहे हो मेरी बर्बादी पे रो दोगे अब पे सच तुमसे कहना पड़ा
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