लगता है हम अब तेरी मेहरबानी पे जीने लगे हैं फिर भी ना जाने क्यूं उदास होने लगे हैं
तूने मेरे हिस्से की चाह किसी और को बाट दी है सोच कर हम अब मजबूर होने लगे हैं
बिछड़ कर तुमसे हसरतें अपनी मिटा दी है करूं क्या बगैर तेरे मरने को सोचने लगे हैं
राह ए तलब चल कर कांटों पर तुमसे दूर हो रहे हैं ऐ जिंदगी हम नाकाम होने लगे हैं
हाल ए दिल अब तुम्हें बताने से फायदा भी क्या सुना कर दर्द तुम्हें हम दूर होने लगे हैं
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