रेगिस्तान मे एक घूँट पानी की पिला दे कोई
ठिठुरती ठंड मे कम्बल ओढ़ा दे कोई
असह्य पीड़ा मे मां से मिला कोई
तड़पते भुख मे रोटी खिला दे कोई
बेचैन रातों मे चैन की नींद सुला दे कोई
निःशब्द क्षणों मे वीणा बजा दे कोई
हृदय के तार झनझना दे कोई
क्या ऐसा है कोई
हाँ वह है
कौन
प्रेम
शाश्वत प्रेम
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X