ये जो हम आजकल लिख रहें हैं।
तेरे हुस्न पर गजल लिख रहे हैं।
गरीबखाना-ए-दिल की बुनियाद पर,
इक और ताजमहल लिख रहे हैं।
नूर-ए-नजर , चमक-ए-रूख्सार और,
पॉंवों की हसीं पायल लिख रहे हैं।
जो सावन की तरह तर-बतर कर देता है,
तेरी जुल्फों का वो बादल लिख रहे हैं।
तेरी नजरों ने जिसे किया था बरबस ही,
वही अपना दिल घायल, लिख रहे हैं।
समझ लेना जो कह रहा है ‘प्रसून’
हाल अपना दर-असल लिख रहे हैं।
-प्रसून मिश्रा
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