सुना है,
चलते हुए कदमों का घर है ज़िंदगी,
बीते लम्हों का कल है ज़िंदगी।
जो पीछे छूट रहा है, वो पल है ज़िंदगी,
और उन उलझी यादों की ग़ज़ल है ज़िंदगी।
खोने-पाने की होड़ में ख़ुद को भूल जाना,
या उन लोगों को रोकते-रोकते, ख़ुद छूट जाना।
हर दिन की एक ग़लती और उसका सबक है ज़िंदगी,
खोज में लगी हूँ, आख़िर क्या है ज़िंदगी।
शीशे में ढलता चेहरा और उसका वो धुँधला रंग,
सूरज की धूप में दिखती वो नन्ही उमंग।
उस रूप में दबा वो किस्सा अंतरंग है ज़िंदगी,
खोज में लगी हूँ, आख़िर क्या है ज़िंदगी।
क्यों कोई सच होकर भी फ़साना लगता है,
क्यों सिर्फ़ एक किस्सा ख़ुशियों का ख़ज़ाना लगता है?
एक फ़हमी, फिर ताउम्र फ़रामोश है ज़िंदगी,
खोज में लगी हूँ, आख़िर क्या है ज़िंदगी।
वो खोया हुआ कुछ पाने की चाहत,
उन पलटे हुए पन्नों को पढ़ने की ताक़त।
दरिया-ए-मौत में छिपा वो डर है ज़िंदगी,
खोज में लगी हूँ, आख़िर क्या है ज़िंदगी।
सुनने-सुनाने की ख़्वाहिश से मुँह मोड़ जाना,
या ढोते हुए कल को पीछे छोड़ जाना।
आगे बढ़ जाने की हर दम एक कसक है ज़िंदगी,
खोज में लगी हूँ, आख़िर क्या है ज़िंदगी।
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