न ज़ेवर, न कंगन, न कोई हार चाहिए,
तेरे माथे को बस एक श्रृंगार चाहिए।
जो देखूँ तुझे तो वक़्त ठहर-सा जाए,
मेरी दुआ है कि तू मुझको मिल जाए।
जब धूप तेरे चेहरे को चुपके से छू जाती है,
तेरी बिंदी और भी उजली नज़र आती है।
जैसे सुबह ने सूरज को माथे पर सजाया हो,
या खुदा ने चाँद को धरती पर बुलाया हो।
तेरी बिंदी में जैसे रब की रज़ा मिलती है,
उसमें मेरी हर अधूरी दुआ खिलती है।
लोग कहते हैं ये बस एक लाल निशानी है,
मैं कहता हूँ, इसमें मेरी पूरी कहानी है।
तेरे माथे पे जो छोटी-सी बिंदी सजती है,
लगता है जैसे चाँद पे रोशनी उतरती है।
तेरी मुस्कान से हर शाम सँवर जाती है,
तेरी ख़ामोशी भी ग़ज़ल-सी नज़र आती है।
तेरी बिंदी को देखा तो सजदे में सिर झुक गया,
इश्क़ मेरे दिल से निकलकर ख़ुदा तक पहुँच गया।
अब और किसी हुस्न की ख़्वाहिश ही नहीं रही,
एक लाल बिंदी में मेरा पूरा जहाँ सिमट गया।
-: प्रखर कुमार सागर
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