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सोलह अगस्त का तिरंगा

                
                                                         
                            कल तक जिसे सलाम था,आज धूल में पड़ा हूँ,
                                                                 
                            
मैं सोलह अगस्त का तिरंगा... चुपचाप खड़ा हूँ।

कल तक थे हाथ सीने पर, आँखों में था उजाला,
आज एक भी नज़र ने नहीं, मुझको फिर संभाला।
जश्नों की भीड़ चली गई, मैं राह में पड़ा हूँ,
मैं सोलह अगस्त का तिरंगा... चुपचाप खड़ा हूँ।

मैं रंग भरने आया था हर दिल के इरादों में,
सिर्फ़ छतों पे क्यों दिखा, क्यों नहीं तुम्हारे वादों में?
रंगों से क्या होगा, रिश्तों से मैं बड़ा हूँ?
मैं सोलह अगस्त का तिरंगा... चुपचाप खड़ा हूँ।

जिसने मुझे उठाया था, उसने ही छोड़ डाला,
कल तक था जिसके माथे, आज पाँव रौंद डाला।
सम्मान एक दिन का नहीं, बस इतना कह रहा हूँ,
मैं सोलह अगस्त का तिरंगा... चुपचाप खड़ा हूँ।

जब अगली बार फहराना, बस एक बात याद रखना—
मुझको नहीं मेरे मतलब को भी, दिल में आबाद रखना।
पंद्रह ही नहीं हर रोज़ सबके, व्यवहार में जड़ा हूँ,
मैं सोलह अगस्त का तिरंगा... चुपचाप खड़ा हूँ।
- प्रखर कुमार सागर
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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