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जवानी की कहानी

                
                                                         
                            अब बसता नहीं है...
                                                                 
                            
फिर भी कंधा भारी लगता हैं
मैं ‘शिक्षित’हूं
काम बराबर पैसे ना मिले तो
बेगारी लगता है

पढ़ने का शौक खत्म होता जा रहा
अब किताब भारी लगता है
मन खिन्न हो गया जैसे....
हाथ में पैसे चाहिए नहीं तो ....बेरोजगारी लगता है

मेरे मन की व्यथा यही है कि
संघर्ष जारी लगता है
देखना ये है कि वर्षों के प्रयास का परिणाम क्या होता है
क्या इस बार पीडीएफ में हमारा बारी लगता है

कैसे और क्या का जवाब तो है तो परीक्षा का
पर कब ... का जवाब भारी लगता है
अब तो मेरी ख्वाहिश भी मुझे मालूम नहीं
जरूरत भी अब जिम्मेवारी लगता है

और....
परिवार भी तो देखना है
उसमें भी तो खुद्दारी लगता है
और नौकरी करने में मौज है ये कहते हैं हम ....
सच कह नहीं सकते उसमें ईमानदारी लगता है

हम मध्यमवर्गीय लोग हैं साहब
एक तरफ जरूरतें और एक तरफ तैयारी लगता है
जब परिणाम अपने हक में न आए तो ...
असफलता में हमारा हिस्सेदारी लगता है

सिर्फ बीज बोने से ही फल नहीं मिलते
उसके लिए भी पहरेदारी लगता है
और मौसम अनुकूल न हो तो
किसानी भी गुनहगारी लगता है

मन हार के भी हारा नहीं है
हौसला जीत की निगहबानी रखता है
और सफलता का पता नहीं ...
पर मेरा समय...संघर्ष से वफादारी रखता है
-प्रज्ञा’
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7 महीने पहले

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