मिरे दिल की दवाई तुम करोगे क्या
मेरे ग़म को तिहाई तुम करोगे क्या
क़फ़स में बन्द है कब से परिन्दा ये
असीरी से रिहाई तुम करोगे क्या
हँसा करके रुला करके सता करके
मुहब्बत की उगाही तुम करोगे क्या
निगाहों के भँवर में डूबती नैया
सफीने की खिवाई तुम करोगे क्या
अभी तक चाक़ दिल धड़के है सीने में
जिगर दिल की सिलाई तुम करोगे क्या
चुनरिया ओढ़ कर अब अपने प्रियतम की
हथेली पर हिनाई तुम करोगे क्या
परेशां होके भटके 'दीप' ये आशिक
नज़र बंदी इलाही तुम करोगे क्या
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X