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परिणति धोखे की

                
                                                         
                            दुनिया से तो
                                                                 
                            
मिलता रहता है धोखा
यूं की बिन मोल
लेकिन मिलता नहीं
यूं ही विश्वास
कमाना पड़ता है उसे
धोखा देने वाले पर
करता नहीं कोई विश्वास
लेकिन है मजबूर फितरत से
वह भी
देता रहता है धोखा
बार-बार वह
'भेड़िया आया', 'भेड़िया आया'
का अलाप कर राग
पर है परिणति क्या
उस धोखे की?
समय पर होते हैं नदारद
सब लोग-बाग़।
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2 घंटे पहले

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