है यह दिन
कैसा आया
जो था अपना
हो गया अब पराया
स्मृति की चट्टानों से
पटकने से सिर
क्या अब होगा
कलेजा निकाल कर
रखने से
क्या अब होगा
थी भोर सुहानी
हो गई अब काली रात
जिंदगी ने दिखा दी औकात
सोचना अब बेकार
कि हो गई क्या यह बात
मिल गई पूरी तरह से अब मात।
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