नहीं थकना है तुझे, कुछ दूर चलकर।
नहीं रुकना है कुछ-एक मोती समेटकर।।
हथेली पे चांद-तारों का,अंबार होना चाहिए।
छा जा जमीं पर गगन बनकर,
ऐसा तेरा विस्तार होना चाहिए।।
प्रवाह तेरा अविरत नदी सा,
क्यूं बने तू मंद-मंदक।
निश्चय तेरा ऐसा हो,जैसे पांव अंगद।।
स्वप्न के हर एक किले पर,
अब विजय की हुंकार होना चाहिए।
जा भी जहाँ तू छोड़ आ पदचिन्ह अपने,
तेरे जीवन का बस ये सार होना चाहिए।।
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