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कोरोना की लीला

                
                                                         
                            याद आता है जब भी बचपन बातें सुनी पुरानी,
                                                                 
                            
याद आती दादी की बातें उसकी कही कहानी,
शोर शराबा कहीं नहीं था थीं सड़कें खाली खाली,
पुरसकुन जीवन था सबका थी चहुं ओर हरियाली,
लोग बाग भी बहुत हीं कम थे थी असली खुशहाली।
सोचा क्या था आयेगा भी वह दिन अपने जीवन में,
सड़कें खाली खाली होंगी शोर कहीं न तन मन में,
दूर तलक जो नजर गड़ाऊं दिखता नहीं है कोई रण में,
हैं क्या कोई लोग भी बसते इस कंक्रीट निर्मित वन में,
हे दुर्भिक्ष ‘कोरोना’ तुमने ‘शरण’ को ऐसा दिन दिखलाया,
सदी इक्कीस के मानव को अठारहवीं में पहुंचाया।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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