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आख़िरकार..... तुम लड़की हो

                
                                                         
                            क्योंकि तुम लड़की हो,
                                                                 
                            
मर्दों से तुम्हारी कोई बराबरी नहीं है
वहशी नजरों का कोई दोष नहीं,
तुम कपड़ों को सम्हालकर पहनों,
क्योंकि,
आख़िरकार तुम लड़की हो।

घर की इज्ज़त तुम्हारे पास ही है,
इसलिए इस चारदीवारी में क़ैद रहो
आवाज़ ऊंची कभी मत करना,
आख़िरकार तुम लड़की हो……

हो सकता है, सपने तुम्हारे भी हो
पर क्यों कर उन्हें पूरा करना है,
हक़ नहीं है, तुम्हें उड़ने का,
आख़िरकार तुम लड़की हो……..

प्यार तुम्हारा भी तो हक़ है,
अच्छा…..
लेकिन शुरुआत करोगी, तो ‘चालू’ हो
नहीं चाहोगी तो ‘वैश्या’ कही जाओगी।
फिर तुम घर की इज्ज़त भी तो हो…

लौट आओ असलियत में,
आखिरकार तुम लड़की हो……
तक़दीर
किसी के पास होती है…
कइयों के पास नहीं….
फिर भी वो जीते है, और जीते है…..

देख लो अपने आसपास….
होगा कोई लाचार,
पैर होंगे पर हाथ नहीं,
बैठा होगा सड़क पर….

पर क्या हो अगर ये लाचारी…
तुम्हारे देह पर लिखी हो,
हां, हो लाचार तुम अगर,
तुम लड़की हो तो।

तक़दीर कितनी भी ताक़तवर हो,
नहीं बदल पाती तुम्हारा नसीब…
वहीं धुंआ, वहीं चीखें, सपनों के घुट कर मरने की आहे
यही शेष है।

तक़दीर भी तुम्हारी देह देखती है
क्योंकि तुम लड़की हो
हाँ….. यही अपराध है
तुम लड़की हो……

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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