हे नारी !
तू स्वयं से हारी
हाथों में ये कैसा प्याला ?
क्या गई थी मधुशाला ?
आंखें तेरी रतनारी
उलझी है सारी
करते हैं कदम डगमग
तू नशे में धूत है अब।
कैसे तेरा घर संसार चलेगा?
संस्कृति में कैसे परिवार ढलेगा?
कैसे होगा कर्तव्यों का निर्वाहन?
भटकेगा इत-उत बच्चों का बचपन।
आओ अब से वापस आओ।
मधुशाला कभी ना जाओ।
सुंदर सा घर संसार सजाओ।
उन्नति पथ पर बढ़ती जाओ।
-पूनम सिंह
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