पगडंडी पर दौड़ता बचपन,
जाने कहाँ विलुप्त हुआ,
माटी से रिश्ता टूट गया,
कैसा यह परिवर्तन हुआ।
कंचों की वह खनक न बाकी,
न गिल्ली-डंडे की तान,
चौपालों की जगह अब जैसे,
सिमट गया सारा जहान।
पोखर, पीपल, नीम की छाया,
सब लगते अनजान,
मोबाइल की चमक में खोया,
भोला-भाला बचपन आज।
जिस माटी में खेला करता,
वह माटी भी मौन खड़ी,
बचपन की वह निर्मल हँसी अब,
जाने किस दिशा में पड़ी।...
-पूनम कुमारी
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