दर्द कुछ यूँ उभरा के एक शायरी बनी
ज़िन्दगी बिखरी बेहिसाब तो शायर बना
खींच कर लकीरें आंसुओं की जर्द से
लफज़ो को मिलकर एक अदायगी बनी
भीगोया दर्दे दरिया में अपना रोम रोम
तब जाकर जनाब कुछ वाहवाही मिली
दर्द कुछ यूँ उभरा के एक शायरी बनी
लड़ती है रोज़ मुझसे तनहाइयाँ अक्सर
न तुझसे ज्यादा तन्हा न लाजवाब कंही
आ बैठ बेफिक्र हो कर तू साथ हमारे
लिखें मिलकर दोस्ती की एक दास्तां नई
दर्द कुछ यूँ उभरा के एक शायरी बनी
जिन्दगी बिखरी बेहिसाब तो शायर बना
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