तुम भोर की ठंडक,
हम साँझ की थकान प्रिय।
तुम महकी फुलवारी,
हम मुरझाई बेल प्रिय।
तुम सागर की लहर,
हम किनारे की रेत प्रिय।
तुम पवन का वेग,
हम धूल का कण प्रिय।
तुम पूर्णिमा का चाँद,
हम अमावस की रात प्रिय।
तुम पेड़ की छांव,
हम दोपहरी की धूप प्रिय।
तुम सरोवर के सरोज,
हम बगीचे की झाड़ प्रिय।
तुम सरिता का बहता जल,
हम ठहरी-सी झील प्रिय।
तुम रिमझिम बरखा,
हम तड़ित झंझावात प्रिय।
तेरा-मेरा मेल न कोई,
तुम क्षितिज,
हम धरा प्रिय... ।
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