मुद्दतों से तरस रहा था मैं जिस पेड़ की छाँव को,
मेरे पहुँचने तक वो पेड़ ही गिर चुका था...
जब उसकी टहनियों को छूकर देखा,
तो लगा मानो कह रही हों—
"मित्र, बड़ी देर कर दी आने में,
हम भी वर्षों से तेरे आने के मुंतज़िर थे..."
शब्द न मिले मुझे कुछ कहने को,
स्तब्ध-सा खड़ा रहा मैं घंटों धूप में,
उखड़ी हुई उन जड़ों के पास...
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