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कोरोना पर कविता

                
                                                         
                            आज उनको मिलना था हमें,
                                                                 
                            
कुछ दिन उनको रोकें चले,
बाद में आने की कहते चलें,
लॉक डाउन पालन करते चलें,
मास्क वास्क प्रयोग करते चलें,
आओ घर के अंदर बैठें चलें।

हाथ साबुन से धोना है बताते चलें,
सेनेटाइजर का प्रयोग करते चलें,
छींक, खाँसी में मुँह को ढक कर चलें
डॉक्टर से चेकअप कराते चलें,
क्वारंटीन, आइसोलेट करते चलें,
आओ घर के अंदर बैठें चलें।

हलो हाय हग से बचते चलें,
प्रणाम हाथ जोड़ करते चलें,
एक मीटर की दूरी बनाके चलें,
चलो उनको भी सलाह देते चलें,
फोन पर बातें सातें करते चलें,
आओ घर के अंदर बैठे चलें।।

मौसमी फल,सब्जी खाते चलें,
योग प्राणायाम करते चलें,
इम्यूनिटी पॉवर बढ़ाते चलें,
नॉनवेज से दूरी बनाते चले,
अफवा बफवाहों से बचते चलें,
आओ घर के अंदर बैठें चलें।

जरूरत हो उतना ही खरीदे चलें।
गरीबों की मदद भी करते चलें ।
भीड़ भाड़ से दूरी बनाके चलें।
खुद भी बचें दूसरों को बचाते चलें।
चलो कोरोना बोरोना को भगाते चलें।
आओ घर के अंदर बैठें चलें।।

हरीमोहन राजपूत
जसवन्त नगर इटावा

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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