टूट कर अभी बिखरा नहीं हूं मैं
अभी मेरे अरमान बाकी है
माना पंखों, में थोड़ा थकान है मेरे
फिर भी अभी मेरा, इँम्तिहा बाकी हैं...
किसने कहा तुमसे कि, सब्र मेरे टूटने लगे
सपने मेरे ,आंसुओं सा ढलने लगे
मैं उस मिट्टी का जन्मा वृक्ष नहीं
जिसे गमलों ने सींचा हैं
मरुभूमि का वृक्ष हूं मैं...
जिसे चलती रेतो ने सींचा हैं
बिना धरा पर गिरे,बोलो चलना किसने सीखा है
बिना रणभूमि में पग रखें, बोलो रण किसने जीता..
बाधाएं,आई है तो टूटेंगी
ज़िद का ज्वार है मुझमें
देखता हूं ये कब तक रोकेंगी...
देखना एक दिन इसी उर से
जीत की धारा फूटेगी
।जीत की धारा फूटेगी।
पवन कुमार यादव
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