हर उत्तर
उच्चारित होना आवश्यक नहीं होता।
कुछ शब्द
जन्म लेते ही
अपने भीतर विनाश की छाया लिए होते हैं।
मैंने कई बार
क्षणिक आवेग में
अपने ही संबंधों की देहरी पर
कठोर ध्वनियाँ रख दीं,
और बाद में पाया—
घाव शब्दों से अधिक
उनकी उतावली ने दिए थे।
अब समझता हूँ,
प्रतिक्रिया और उत्तर
एक ही वस्तु नहीं।
प्रतिक्रिया प्रायः
अंतर के असंतुलन से जन्मती है,
जबकि उत्तर
एक लंबे मौन के बाद
धीरे से खुलने वाला द्वार है।
कभी-कभी
रुक जाना ही
संवाद का सबसे गहन रूप होता है।
उस विराम में
अहम् की धूल बैठती है,
और भीतर कहीं
करुणा अपनी आँखें खोलती है।
संबंध
तर्क से अधिक
संवेदनाओं के सूक्ष्म तंतुओं पर टिके होते हैं।
हर मतभेद
युद्ध नहीं होता,
जैसे हर मौन
पराजय नहीं होता।
अब जब भीतर
कोई तीखा शब्द जन्म लेता है,
मैं उसे तुरंत संसार में नहीं भेजता।
पहले उसे
अपने ही एकांत में बैठाकर देखता हूँ—
कि वह पीड़ा से उपजा है
या समझ से।
और प्रायः
उसी क्षण
शब्द विलीन हो जाते हैं,
केवल एक शांत उपस्थिति बचती है—
जो किसी टूटते हुए संबंध को
धीरे से थाम लेती है॥
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