अधरों पर ताला,
नयनों में ज्वाला।
चुप मैं था—
या था उजाला?
भीतर स्पन्दन,
बाहर निस्तब्ध।
जग ने कहा—
"यह मौन।"
कागज़ ने छुआ,
शब्द झर गए।
मैं अनकहा,
अर्थ भर गए।
लेखनी चली,
जड़ता पिघली।
मौन की कोख से,
दृष्टि निकली।
शब्द नहीं थे,
केवल संकेत।
रिक्त हुआ मैं,
शेष अनिर्वच।
अब प्रश्न यही—
कौन लिखता है?
मैं मौन में,
या मौन मुझमें?
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