नक्शों पर अंकित नहीं
वह अनचीन्हा मोड़—
वहीं ठिठका है अंतर्मन।
पग आगे बढ़ते रहे,
पर लौटता रहा कोई
जिसे अभी तक
अपना नाम भी ज्ञात नहीं।
घड़ी की सुइयों से बाहर
काल का एक निस्तब्ध वृत्त है;
जहाँ प्रत्येक क्षण
कुछ अनकहा झर जाता है,
और बिना किसी घोषणा के
भीतर
एक अपरिचित आकार जन्म लेता है।
शिखर ने कभी नहीं बताया
ऊँचाई का रहस्य;
वह तो जड़ों ने सुना है,
जो अंधकार में उतरकर भी
मिट्टी से प्रश्न करती रहती हैं।
नदी भी शायद
सागर तक नहीं,
अपने बहाव तक पहुँचती है।
"मैं कौन हूँ?"—
यह प्रश्न नहीं,
एक धीरे-धीरे खुलता हुआ द्वार है।
नाम झरते हैं,
परिभाषाएँ थक जाती हैं,
और शेष रह जाता है
वह, जिसे कोई संबोधन नहीं छूता।
जो बदलता रहा,
वह केवल अनुभव का परिधान था।
मैं शायद वह दृष्टि भी नहीं—
केवल देखने का
एक मौन अवकाश,
जहाँ बहते जल में
आकाश स्वयं को पढ़ता है।
अब न कोई गंतव्य शेष है,
न लौटने की उत्कंठा।
केवल एक अनाम निस्तब्धता है,
जहाँ 'मैं' की अंतिम प्रतिध्वनि भी
शून्य में विलीन नहीं होती—
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