काल के उस छोर पर
जहाँ दृष्टि लौट आती है,
वहाँ
कल नहीं रहता—
केवल एक मौन होता है।
मैं उसी मौन को
अर्थ देने में
कितना जीवन
व्यर्थ कर चुका हूँ।
यह श्वास—
न भविष्य है,
न स्मृति।
यह केवल
अपनी उपस्थिति का
निर्विवाद प्रमाण है।
फिर मैं
जो स्पर्श में है,
उसे छोड़कर
जो केवल संभावना है,
उसके पीछे क्यों चलूँ?
शायद
दुःख पहले नहीं आता।
हम ही
अपनी कल्पनाओं से
उसका आकार गढ़ते हैं।
और फिर
अपनी ही निर्मित छाया से
डरकर
उजाले से दूर हो जाते हैं।
नियति
उत्तर नहीं देती।
वह केवल
प्रश्नों को
और गहरा कर देती है।
शायद यही उसका धर्म है—
कि मनुष्य
अनिश्चितता के साथ भी
जीना सीख ले।
ओ मन,
तू किस निर्णय पर रोता है?
जिसे समय ने
अभी लिखा ही नहीं,
उसका शोक
किस ग्रंथ में अंकित है?
क्या तेरे अश्रु
उस भविष्य को बदल देंगे,
जिसका जन्म भी
अभी नहीं हुआ?
अब जानता हूँ—
अज्ञान
शत्रु नहीं है।
उसी की गोद में
विश्वास जन्म लेता है।
कल यदि आएगा,
अपने समय पर आएगा।
पर यह क्षण—
अभी,
यहीं,
मेरे भीतर
जीवन बनकर धड़क रहा है।
मैं इसे
किसी अनलिखे कल के लिए
अब और
स्थगित नहीं करूँगा।
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