वृक्ष के पत्तों की तरह हम बिखर गए,
जब तक वृक्ष पर लगे थे, हरे भरे थे,
डाली से छूटे, गिर गए, बर्बाद हो गए।
जुडे रहें हम सब अपनी संस्कृति से,
ऊंचे उठो पर नींव को मत भूलना,
फिर भविष्य में याद आएगा,
कि हम अलग थलग हो गए।
-चंद्र दत्त शर्मा
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