इस दिन तो कर ली तुमने अपनी मनमानी,
रात गई, भोर हुआ, अब आ गई मेरी बारी।
सब दिन न हों एक समान, यह बात जानी,
पता नहीं... कब किसका हो पलड़ा भारी?
-चंद्र दत्त शर्मा
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