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उम्र ग़ालिबन

                
                                                         
                            ख़ुद को तलाशते हैं यहाँ ओढ़ कर कफ़न
                                                                 
                            
हम इक ख़याल-ए-पैकर-ए-ज़िंदान में दफ़न

हमने तो एक तिलिस्म की ख़्वाहिश ख़ुदा से की
हज़रात पेशगी में उठा लाए हैं बदन

जन्नत गई है जाँ कि जहन्नुम पता चले
तस्दीक के लिए कोई ढूँढेंगे बर-हमन

इक शख़्स के ख़्याल में अब याद भी नहीं
हमने गुज़ार दी है कोई उम्र ग़ालिबन

दिल की निगह से देखिए चेहरे को इक नज़र
मुद्दत के बाद आँख से उतरा है पैरहन

दहशत अजीब सी है मिरी साँस में धुआँ
ख़्वाबों में आजकल मिरे जलता है फूलबन

जल्दी मेरे वजूद की मिट्टी कुरेदिए
हैरत करेंगे आप भी निकलेगा कोहकन
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एक घंटा पहले

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