मैंने उस रात सोचा...
कि मन को मारा कैसे जाता है?
और इस मन के विरुद्ध,
आख़िर काम किया कैसे जाता है?
रातों तक सोचती हुई बातों में,
मन के द्वारा ही विराम दिया जाता है,
जब अपने ही भीतर...
इस मन के मन की जाँच किया जाता है।
मन की लालसा के भीतर,
यूँ ही मर जाता है आदमी,
और बस चलते हुए भी,
कुछ कर पाता नहीं है आदमी!
भावनाओं में बहते-बहते,
ये रास्ते मुश्किल हो पड़े,
जैसे चलते हुए रास्तों में,
अचानक बैरिकेड खड़े हो पड़े!
पर निश्चित है निकलना इसमें से,
बस मन की कठोरता को बनाए रखना है इसमें,
रास्ते कभी खुद सरल बनते नहीं...
रास्ते तो बनाने ही पड़ेंगे!
बहते हुए उस मन में,
अब अति अस्थिरता नहीं चलेगी,
स्थिरता के उस अडिग बांध को...
अब हमें बनाने ही पड़ेंगे!
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