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ग़ज़ल

                
                                                         
                            धरती कभी मैली नहीं होती
                                                                 
                            
दर्पण कभी झूठा नहीं होता

हर मर्ज की दवा तो है
दवा से हर मर्ज सही नहीं होता

ये जो दुनिया के रखवाले बैठें हैै
इनका खुद का कोई खुदा नहीं होता

अश्क बहते हैं ये जो दिल रोता है
इनकी वजह कोई दूसरा नहीं होता

देखकर चल ए मुसाफ़िर अक्सर लोग भटक जाते हैं
हर राह पर आसरा देने वाला घर नहीं होता

बहुत नाज़ुक होते हैं ये रिश्ते हर बात परखना ए लोगों
कभी-कभी आँखों देखा भी सच नहीं होता

जो भी करना है आज ही कर डालो
अक्सर सबको मयस्सर यहां कल नहीं होता

धरती कभी मैली नहीं होती
दर्पण कभी झूठा नहीं होता
-निशा रानी गुप्ता
 
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3 वर्ष पहले

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