काल से कोई बच ना पाया रे बंदे ।
काल से कोई बच ना पायेगा ,
चकाचौंध की रोशनी में ,
प्रलोभन की चाशनी में डुब के ,
मायाजाल के नगरी में ,
काल के गाल में समा जायेगा ।
काल धरने से पहले अपना सुधर्म निभा ले ,
गाले प्रेम का गीत ,
मानवता का धर्म निभा ले ,
प्रेम से जुड़े प्रित हरि ,
मन जुडे मित ,
कण -कण में विराजे हरि ,
तृण -तृण से कर ले मित ,
संचित धन सब धरा रह जायेगा धरा में ,
अमर हो जायेगा तेरा कृत्य ।
काल से कोई न बच पाया रे बंदे ,
काल से ना कोई बच पाएगा ,
किस्मत के लकीरों से मायाजाल की नगरी में लगा लो रेस ,
किसी को मिलेगा अमन ,
किसी का खिलेगा चमन,
किसी की नसीब बंजर जमीन में सपनों का गुल उगायेगा ।
ये अंहकारों के सौदागर
मत कर तुम गुमान इतना
मिट्टी में पनपी तिनका है मिट्टी का ,
मन की चंचल से कनक कंचन की कवच मत बना ,
ये कनक की हृदय है मिट्टी में ।
हम भी यहां फकीर ,
तुम भी यहां फकीर ,
हम फकीरों का यहां क्या अफसाना ,
किराए की कुटिया में अंहकार की दिये क्यों जलाना ,
संचय धन से इस मिट्टी का क्या रे पगला ,
किसी की हाथों में खुदा ने खिंची नहीं ऐसी लकीर ,
संचय धन जीत कर ले जाए स्वर्ग धीर । ॥
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