इस जमाने से बस पहचान छुड़ा कर आया हूं
खोने वाला था जो सम्मान छुड़ा कर आया हूं
जमीं तो छुड़ा ना सका इस भरी कश्मकश में
शुक्र है कम से कम आसमान छुड़ा कर आया हूं
एक दूजे के दुश्मन बने बस शैतानों के झुंड है
कैसे बताऊं मैं तुम्हे बस जान छुड़ाकर आया हूं
इस लुटे हुए इंसा पर खोने को कुछ बचा नहीं
खो कर सारा जहां बस मुस्कान छुड़ाकर आया हूं
-नीटू मावी
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