आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फुटबॉल की मानिंद जम्हूरियत।

                
                                                         
                            संसद ,सड़क या फ़िर अदालत।
                                                                 
                            
फुटबॉल की मानिंद जम्हूरियत।
युं ही नहीं फैलता इंतिशार कही,
सियासतदानों की खोटी नियत।
मेरा सच वाे सुन ही नही सकता,
झूठ बोलते रहना उसकी आदत।
मुल्क ये बीमार होता चला गया,
अहले-सियासत की ये सदाक़त।
सच तो बता दो कि तुम हो कौन,
जम्हूरियत की ताक़त या लानत।
-जयंत दिक्षित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर