बेईमानी पूछती ईमान से तुम्हे दाम का क्या।
ईमान कहता,अब यहां हमारे काम का क्या।
माफियाओं का मिट्टी मे मिल जाना मोज़ूँ है,
मुहाफ़िज़ों के सरक़ा परस्त निज़ाम का क्या।
माल-ए-हराम खाया,कज-किरदारी करते रहे,
जम्हूरियत से मोहतरम,अब बदनाम का क्या।
थे और भी सुख़नवर,सोज़-ए-दरूँ-ए-ग़ालिब,
फिर जो हासिल,मक़ाम-ओ-इकराम का क्या।
भूखा हर निवाले मे अपना ख़ुदा ढूंढ़ता रहा है,
फ़ाक़ा-कश जिंदगी में रहीम-ओ-राम का क्या।
- जयंत दिक्षित
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