रकीबों की गिनती मे तादाद यारों की।
सियासत मे है ज़ुबानअब बंटवारों की।
रोज मट्ठा डाल रहे तुम्हारी ही जड़ों पर,
घी पर भी है पकड़ उनके परिवारों की।
हनूज़ खुद को सुपर पावर समझता है,
उसे जरूरत है , मानसिक उपचारों की।
ख़ादिम-ए-क़ौम सा नजर पड़ा माफिया,
क़ुव्वत देखिये आजकल इश्तहारों की।
सोशल मीडियाकी ख़ैरगी-ए-नज़र और,
घर से मादूम कतरने भी अखबारों की।
-जयंत दिक्षित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X