सच सुनकर हमारा ख़ून खौलता है।
जुबा ही सिल दो,ये बहुत बोलता है।
'हुआ तो हुआ',संविधान लहरा रहा,
वो बस किताब का दाम टटोलता है।
सत्ता जानती है सभी से काम लेना,
मुर्गा चूल्हे पर,मोर द्वार पे डोलता है।
तुमने निर्लज्जता की सारी हदे लांघी,
और हम यही कहते रहे,ये चलता हैं।
पहले चूहा मारने की दवा बेचता था,
अब जनसभाओं मे शहद घोलता है।
- जयंत दिक्षित
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