तुम्हारी जो कटी,उजालो की रात थी।
अपनी तो फांकों,निवालों की रात थी।
दर्द शब्दों से बोला गीत ना बन जाना,
मेरे चश्मे-पुर मे, सवालों की रात थी।
बंटवारे की आग मे मुल्क धधक उठा,
वो चंद कुर्सी के दलालो की रात थी।
सभीने लुटा,उनकी हैसियत से ज्यादा,
गंजो के लिये काले बालों की रात थी।
नजारे हसीं थे,पर कुछ दिखाईं न पड़े,
अंधों की बस्ती मे उजालों की रात थी।
- जयंत दिक्षित
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