प्यारी धरती, कुछ नही कहती है,
सीने पर हर वार सहती है,
जख़्म भुला कर वो अपना
सबको खुशहाली देती है,
बूंद बूंद को तरसते लोग,
फिर भी नही समझते लोग
पानी का कोई मोल नही,
जल बर्बाद करते लोग,
आने वाली पीढ़ी को,
तुम क्या देखकर जाओगे,
पानी के लिए जंग लडेंगे,
बेमौत लोग मारे जायेंगे,
अभी नही तुम चेते तो,
कल तो देर हो जायेगी,
नदी नाले सब सूख गये,
कैसे धरती की प्यास बुझेगी।
हे पथिक,
श्रृंगार धरा का , कौन करे
अब काम यही कर जाओ तुम
जल बचाओ, वृक्ष लगाओ ,
जीवन मे अमर हो जाओ तुम।
"नीरज सिंह "
टनकपुर(चम्पावत)
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