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ग़ज़ल

                
                                                         
                            आज फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं हम।
                                                                 
                            
जिसे छोड़ कर आ गए थे हम।।
मीलों दूर चलने का शौक न था।
रिश्तों की दहलीज पर खड़े हम।।
जो अपने थे परायों से कह कर चले आते।
क्या जिंदा है हम कहां पड़े हैं हम।।
छीन कर हर खुशी मेरी सुकून में हैं।
करता पता कहां चले गए हैं हम।।
नीलम यदु


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6 वर्ष पहले

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