आज फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं हम।
जिसे छोड़ कर आ गए थे हम।।
मीलों दूर चलने का शौक न था।
रिश्तों की दहलीज पर खड़े हम।।
जो अपने थे परायों से कह कर चले आते।
क्या जिंदा है हम कहां पड़े हैं हम।।
छीन कर हर खुशी मेरी सुकून में हैं।
करता पता कहां चले गए हैं हम।।
नीलम यदु
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X